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देवास में ये पद है कि पनौती ?

– देवास की महापौर कुर्सी राजनीतिक सन्यास का रास्ता
– जो भी महापौर बना वह राजनीतिक गलियारों में खो सा गया
– महापौर बनने के बाद नहीं मिलता लाभ का कोई पद
राजनीतिक संवाददाता, देवास: देवास नगर निगम में महापौर कार्यालय में लगा यह बोर्ड देखिए। सुनहरी पट्टिका पर आठ नाम जगमगा रहे हैं। लेकिन राजनीति का सूर्य जैसे इन पर डूब ही जाता है। देवास की महापौर कुर्सी ऐसी है कि जिस दिन कोई उस पर बैठा, उसी दिन उसकी राजनीतिक गिनती उलटी शुरू हो गई। जिस प्रकार देवास में भाजपा जिलाध्यक्ष का पद राजनीतिक निर्वासन की ओर ले जाता है, उसी प्रकार महापौर का पद भी राजनीतिक सन्यास की गारंटी बन गया है।
जो यहां एक बार महापौर बन गया, वह धीरे-धीरे गुमनामी के बादलों में कहीं खो सा जाता है। महापौर बनने के बाद देवास में किसी भी नेता को कोई बड़ा लाभ का पद हासिल नहीं हो पाया। हालांकि पांच साल की महापौरियत बाकी बचे जीवन के लिए सम्मान की गारंटी तो है, परन्तु यहां रहे महापौरों की हालत देखने के बाद कहा जा सकता है कि इसके बाद उनकी राजनीति में कुछ खास नहीं रह जाता है। चाहे कांग्रेस हो या भाजपा पूर्व महापौरों के सितारे दोनों ही दलों में गर्दिश में चले जाते हैं।

याद कीजिए इन नामों को-

शकीला हाजी हारून शेख। इनका कार्यकाल 5 जनवरी 1995 से 7 जनवरी 2000 तक रहा। देवास की पहली महिला महापौर बनीं और अपने समय के प्रभावशाली नेता हारून शेख ने प्रतिनिधि के रूप में काम देखा। कार्यकाल खत्म होते ही जैसे पूरी सियासत ने उन्हें भुला दिया। जो भी मंच दिखा, दरवाज़े आधे खुले, आधे बंद।

जयसिंह ठाकुर। इनका कार्यकाल 8 जनवरी 2000 से 4 जनवरी 2005 तक रहा। राजनीतिक क़द अच्छा था, पर कुर्सी छोड़ते ही जैसे किस्मत भी छुट्टी पर चली गई। महापौर का पद जाने के बाद टिकट भी मिला लेकिन जीत से दूर रहे। कांग्रेस की राजनीति में अभी भी मजबूती से खड़े हैं लेकिन कांग्रेस की सरकार नहीं आ रही तो लाभ के पदों से दूर ही हैं।

शरद पाचुनकर का कार्यकाल 5 जनवरी 2005 से 10 जनवरी 2010 तक रहा। महापौर कुर्सी की पनोति के मामले में अपवाद रहे , क्योंकि इनको प्राधिकरण की जिम्मेदारी भी मिली। भाजपा के नेता हैं परन्तु चुनाव निर्दलीय लड़े थे। खूब काम भी किए और नाम भी कमाया। बाद में सियासी हवा ऐसी बदली कि नाम सिर्फ़ पुरानी तस्वीरों में रह गया। देवास की गलियों में लोग अब सिर्फ़ कहते हैं, उनका कार्यकाल बहुत अच्छा था। पार्टी की बैठकों में वरिष्ठ नेता के रूप में सम्मान मिल रहा है, परन्तु लाभ का पद नहीं।

रेखा वर्मा का कार्यकाल 11 जनवरी 2010 से 31 दिसंबर 2014 तक रहा। महिला सशक्तिकरण का चेहरा कही गईं। एकमात्र महिला महापौर जिनके पीछे किसी पुरूष का ठप्पा नहीं था। पूरी तरह से आत्मनिर्भर और कार्याें को करने में दक्ष महापौर के रूप में जानी जाती हैं। भाजपा की परिषद होने के बावजूद पूरे कार्यकाल को निर्विवाद निबटाया। कार्यकाल ख़त्म होने के बाद राजनीतिक परिदृश्य से पूरी तरह गायब हो गईं। अब कभी-कभी ही राजनीतिक कार्यक्रमों में दिखाई देती हैं।

प्रेमकुमार (सुभाष शर्मा) 1 जनवरी 2015 से 31 दिसंबर 2019 तक महापौर रहे। तत्कालीन मंत्री तुकोजीराव पवार के सबसे ज्यादा समर्थन प्राप्त नेता होने के कारण आसानी से जीते। इनसे सभी को उम्मीदें थीं, काम भी किया, लेकिन राजनीति में काम नहीं, “कनेक्शन” चलते हैं। कुर्सी गई तो सब गया। अब भाजपा की राजनीति में अपने लिए कोई पद की तलाश इनके लिए जरूरी हो गया है।

बीच में दो “प्रशासक” कलेक्टर आए डॉ. श्रीकान्त पांडेय 2020 में जनवरी से जून तक और इसके बाद कलेक्टर चन्द्रमोली शुक्ल जून 2020 से अगस्त 2022 तक रहे। ये अधिकारी थे, राजनेता नहीं इसलिए इनके लिए देवास की “पनोती कुर्सी” सुरक्षित रही। वे आए, चले गए, और शासन चलता रहा।

फिर आईं गीता दुर्गेश अग्रवाल 2 अगस्त 2022 को प्रचंड जीत के साथ देवास की महापौर पद पर विराजित हुईं।
इनके पक्ष में ऐसी लहर आई, जैसी इनके पूर्व किसी महापौर के लिए नहीं थी। बड़ी जीत से इनको बड़ी जिम्मेदारी मिली है, लेकिन पिछले तीन सालों में बहुत बड़ी उल्लेखनीय सफलता इनको नहीं मिली है।

वर्तमान महापौर के सामने भविष्य है, परन्तु देवास की इस कुर्सी का इतिहास डराता है। हर बार जो भी बैठा, सत्ता के बाद सन्नाटा उसका साथी बन गया। जनता कहती है “देखो, ये तो वही कुर्सी है, जहां बैठकर सितारे गर्दिश में चले जाते हैं।” देवास का यह ‘महापौर-ग्रह’ अब राजनीति के ज्योतिषियों के लिए भी पहेली है। पांच में से कोई भी महापौर उस चमक के साथ वापसी नहीं कर पाया है। न कोई बड़ा पद, न टिकट, न सक्रिय राजनीति।

सियासत में ये ‘पूर्व महापौर’ अब पूर्व से ज़्यादा कुछ नहीं रहे। गाड़ियों में चंद साथी और कहानियों में बस “कभी महापौर थे” का सम्मानजनक उपसर्ग। नगर निगम के बाहर बोर्ड चमकता है, नाम उभरे हुए हैं पर हालात पूछिए तो सब फीके। यह कुर्सी मानो देवास की राजनीति की “काली बिल्ली” बन गई है, जिसे पार करते ही सियासी सफर ठहर जाता है।

देवास की जनता अब मज़ाक में कहती है “नगर निगम की कुर्सी नहीं, ग्रहण है। अब देखना यह है कि मौजूदा महापौर इस ‘पनोती परंपरा’ को तोड़ पाती हैं या नहीं। क्योंकि देवास में अब सवाल यह नहीं कि कौन बनेगा महापौर, सवाल यह है कि कौन बच पाएगा महापौर बनने के बाद?

इतिश्री.

बाकी अगले अंक में…

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